"THINK RICH LOOK POOR"

Thought of the day....

Things that are done,it is needless to speak about: Things that are past it is needless to blame.....

Wednesday, July 28, 2010

Shoes

    

Karnataka Government has made a huge progress in terms of increasing primary education attendance rate and expanding literacy approximately two thirds of the population. Karnataka improved education system is often cited as one of the main contributors to the economic rise of India. Government has provided everything like mid day meal, clothes, books but not providing shoes to school students. In the Government school at golahali, Gonipura, Khumbalgudu only 4 % students wears shoes in the school and rest of them are without shoes. A primary government school teacher Mr Santosh said that only 206 students are studies here and they are belongs to very poor background. Government has provided only little things and rest of them donate by rich people of the village. He tells to us there is no proper bench and mostly students sit on land also. In primary school Government has provided free education for girls but it has only to till seventh standard. SDM has never visited to primary school. Students are suffering every time because administration never wants to take interest on basic needs of students. In government high school,Golahali.Mostly students used to wear shoes.school teacher said that we are doing so much struggle and government has not provided shoes, many students are coming from very poor farmer background and they don’t have enough money to buy shoes.School teacher praba told to us many times we help them and providing shoes or basic needs of students personally. In high school only 288 students are studies. School faculty is struggling with funds.Ms praba tells us about K.v.krisnaapa. k v krisnaapa is a member of panchayati raj but he knows as funds donator. He done alots of things for school and students also. He also donates notebook in which he paste his picture in front of notebook like personal promotion.

Head master tell us school gets only little amount of funds from the State Government and rest of them comes  from donator. Students tells us they want proper education,toilets,clean class,banch,play ground but until they did not get yet. In many state Government school does not has boys toilets.Toliets is basic needs in each school. The last consignment of bench had come in 2005 and government school is suffering from lack of facility. Government does not right to show Sarva Shiksha Abhiyan Samithi – Karnataka. In every Government school has lack of facility and funds.

Friday, July 23, 2010

आक्रोश




आज आम आदमी के अंदर आक्रोश है, आज हम आपको इन कुछ तस्वीरों से यह दिखाने का काम कर रहे है,पत्रकारिता को लोकतन्त मे 4 स्तंभ का दर्जा दिया गया है,मगर पत्रकारिता को मैंने स्रिफ गरीबो से दूर ही  देखा है.भला पत्रकारिता गरीबो से दूर क्यों ना हो उनके पास कोई कहानी नहीं होती मगर अगर किसी नेता,अभिनेता  या क्रिकेटर को शूट करना हो तो बोहोत से पत्रकारिता से जुड़े लोग उस मे जाना पसंद करेंगे.

किसी का गुस्सा या आक्रोश को ही दिखाना ही पत्रकारिता नहीं है,मगर कभी कभी खबर का मोड़ गरीबो के लिए भी होना होगा तभी ही पत्रकारिता को सही मायनों मे जाना जा सकता है.

जय प्रकाश नायारण ने भी मीडिया को यही सन्देश दिया था की गरीबो के साथ चलो मगर उस दौर की मीडिया गरीबो की आवाज़ भी उठा दिया करती थी मागर  आज की मीडिया को स्रिफ कुछ लोगो की मुट्टी मे बंद पाया जाता है. 

पत्रकारिता को ही लोग समाज समजते है जो पत्रकारिता के दुवारा जो दिखाया जाता है लोग को वही सच लगता है चाहे वोह कुछ भी हो.मीडिया को फिल्म स्टार या क्रिक्केटर की पेरसोनल लाइफ दिखाना इतना पसंद हो गया है की पुरे दिन मे हर चानेल मे यही दीखता है.क्या मुद्दों की कमी है या पत्रकारिता की? 

48 %जनता गरबी मे जी रही है मगर यह मुद्दा मैंने शायद ही कभी संसद मे,न्यूज़ पेपर,न्यूज़ चानेल मे देखा हो,इस मुद्दे को एक दो बार उठा देना पत्रकारिता नहीं है इस के खिलाफ लड़ाई लड़ना एक तरह की पत्रकारिता होनी होगी तभी सरकार को फर्क पड़ सकता है,


Sunday, May 16, 2010

चलो आज २००० शादिया है वोह भी DELHI मे.....










और ना जाने कितनी मोटर भी हो.... अरे यह कोई दह्रेज तोड़ी ना है यह तो हर माँ बाप अपनी कन्या को देते हे है सात फेरो की रकम ना समजना जनाब यह तो माँ बाप का प्यार होता है जिस का फायदा आज के ज़माने मे काफी लोग उठा लेते है और माँ बाप तो बेटी के  घर के लिए बोहोत सारे उपहार भी देंगे ही.अरे पुरानी समय मे गये,घोड़े, दिए जाते थे और आज इन की जगह मोटर,कार,सोना,प्लाट.नि ले ली है.अरे ज़माना बदल रहा है बस हमारी कल्पना नहीं बदल रही है....वही पुराणी सोच दह्रेज देंगे तो बेटी खुश रहेगी वरना उसका जीवन कटीं हो जायेगा....





दह्रेज तो हम लोगो से ही बनता है,माँ बाप अपना मन मार मार कर एक रकम जोड़ते है और कोई सयाना कौवा सब कुछ ले जाता है और साथ मे बेटी भी ले जाता  है. कमाल की बात ऐसा तो स्रिफ गाँव मे होता हो तो आप गलत सोचते है अरे हर जगह यह हाल है ,यह साँप हे ऐसा है की हर लड़के के गले मे लटका हुआ है शिव शंकर भगवन वाले साँप की तरह मगर दोनों सापो मे ज़मीन और पहाड़ जैसा अंतर है...भला  लड़का तो हमेशा यह कहेता है" देना है दे दो वैसे हमारे घर मे किसी वास्तु की कमी नहीं" ,आप को देना है जो भी वोह अपनी कन्या को दे देना,बस यह दो बाते और माँ बाप का दिल बिलकुल emotional हो जाता है .....






















                                                                        












Saturday, May 15, 2010

बस अब गरीबी जाने वाली ही है देश से , यह सुनते सुनते उम्र के ७० बरस गए....



बस अब गरीबी जाने वाली ही है देश से ,
यह सुनते सुनते उम्र के ७० बरस गए....
कफ़ी आज़मी.

कफ़ी दिन हुए की मै अपने आप से अक्सर यह पुच जाता की यह लोग कैसे २० रुपए मे अपना दिन गुज़र लेते है,
अगर मै होता थो यह कभी नहीं कर पाता.. 

मुझे इन सब बातो से करना भी क्या है भला मेरे घर मै थो २ वक़्त का खाना है और जिंदगी मजे मै चल रही है,मगर खुद से नजर नहीं मिला पाता जब इन लोग का  सामना होता है मेरा फूटपाथ मे..
जब कोई रिक्क्षा वाला मुझ से २० रुपए मांग लेता है थो मेरा खून जल जाता है भला क्यूँ न जले वोह भला कोई सरकारी बाबु थोड़ी है जिस को मे खुशी खुशी टेबल के नीचे से कुछ नोट या कुछ रुपए के बण्डल दे दू , अरे साहब यह लोग मेहनत करते है बस यह सरकारी बाबु नहीं है जिन पर मे हमेशा मेहरबान रहू...



यह तो मेरे देश का गरीब तपका है जिस को हर कोई नाराज़ अंदाज़ करता है तो भला मे क्यूँ ना करू...

हाँ अगर यह गरीब सरकारी बाबु होते तो मे भी इन की उतनी ही खातिरदारी करता जितनी कभी किया करता हु..

एक युग का अंत ....श्री भैरों सिंह शेखावत का निधन ....

भैरों सिंह (23 अक्टूबर 1923 जन्म शेखावत - मई 15, 2010 को इस दुनिया को छोड़ गए ) 11 उप भारत के राष्ट्रपति थे. वह अगस्त 2002, जब वह निर्वाचक मंडल द्वारा कृष्णकांत की मृत्यु के बाद एक पांच साल का कार्यकाल के लिए चुने गए में से है कि स्थिति में सेवा की है, जब तक वह 21 जुलाई, 2007 को प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति पद के चुनाव हारने के बाद इस्तीफा दे दिया. शेखावत ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पार्टी, चुनाव के समय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के प्रमुख सदस्य के एक सदस्य था. वह तीन बार राजस्थान राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा, 1977 1980 से, 1990 तक 1992 के लिए, और 1993-1998....




उसके पिता का नाम श्री देवी सिंह शेखावत था और उसके माता श्रीमती बन्ने कंवर थी  वह खाचारिअवास  के गांव में पैदा हुआ थे. राजस्थान में सीकर जिले में है. वह श्रीमती सूरज कंवर की शादी है और वे एक बेटी श्रीमती रतन कंवर, जो श्री नरपत सिंह राजवी, राजस्थान के वरिष्ठ भाजपा नेता और सरकार में एक पूर्व कैबिनेट मंत्री से शादी कर रहा है. राजस्थान की. वे तीन मूमल राजवी, बेटी और विच्क्रमादित्य सिंह राजवी, अभिमन्यु सिंह राजवी-बेटों बच्चे हैं.....











Friday, May 14, 2010

कहेने को है की पानी कम है मगर जो है उस की कदर तो करे जनाब.

कहेने को है की पानी कम है मगर जो है उस की कदर तो करे जनाब......


हमारे देश मे पानी काफी अहम मुद्दों मे से एक है मगर ऐसा कम  देखा गया है की किसी नेता ने इसह मुद्दे को संसद मे उठा पाने की जमायत की हो..




सबसे पहेली तस्वीर अगर हम आप को दिखाना चाहे तो पहेले कुछ इस तरह से उभर कर सामने आती है ......
सरकार दावा करती है की ग्लासिएर बिलकुल सुरशित है ,मगर एक तस्वीर आप को सीदा दिखा थे जो दिल्ली की है जी हाँ सीदा राजधानी से जहाँ एक आम आदमी पानी के लिए कितना  कितना सुरशित है.....





जब राजधानी का यह हाल है तो सोच लेना ही काफी होगा की पुरे देश मे क्या हाल होगा.....
मगर यह मुद्दा इतना अहम नहीं है,जितना की संसद को रोज भंग करना ,या सीदा मे कहे तो रुकावट पैदा करना पर भला कोई कर भी क्या सकता है...हमारा काम तो बस वोट डालनी तक ही  सीमित रहे गया है.....

अब  आप को एक तस्वीर और दिखा जाते है ,जाते जाते मगर जरा ध्यान से और समाज को अब  समज लेने की जरुरत है की अभी भी बाजी वोटर के हाथ मे ही है बस मौका मिलने के देरी है......



तो सोचना  होगा की अब  करना क्या है ........



अगर साइडइफेक्ट देखे जाये तो बोहोत होते है मगर यहाँ मामला जरा राजनीती के स्तर  उपर उत्ता ने का है ... जिस के   कल्पना भी नहीं की जा सकती आज राजनीती उस स्तर तक चले गयी है...

बिलकुल कफ़ी आज़मी की कुछ पंतियो के साथ  अब हम विदा लेते है.....


बस्ती जो अपनी हिन्दू मुसलमान जो बस गए ......
  इंसान की तस्वीर देखेने को हम तरश गए....
  कफ़ी आज़मी

सब खेल है भैया मगर जरा देख कर देखना

कुछ समय पहेले एक नाटक आया करता था फ्लॉप शो,हाँ अगर आप को याद होगा, जसपाल भट्टी जी इस नाटक के जरिये  आम लोगो की परेशानी को दिखाया करते थे, नाटक काफी पोपुलर भी रहा और आज भी है,मगर आज का जसपाल भट्टी भी खो  गया है क्युकी जो सन्देश वोह अपने नाटको के जरिये लोगो तक,सरकार तक,ले जाना चाहते थे वो आज की रंगीन स्क्रीन मे नहीं दिखाई देता .....


मौजूदा हाल मे कहे तो इस की जगह रिअलिटी शो ने ले ली  है,मगर जसपाल भट्टी साहब भी सच दिखा जाते थे अपने हिसाब से ...


मगर आज की मौजूदा हालत तो यही बयां करते है की जनाब लोगो को खुश रखना है तो वही दिखाओ जहाँ हमारा भी फायदा हो और देखेने वाले दर्शको का भी....


अगर एक दो न्यूज़ चानेल को छोड़ दे तो बाकि भी वही दिखाते जो दर्शको को मनोरन्ज लगे ,मगर जब खुद की बात आती है तो तस्वीर बिलकुल उलट जाती है ....


अगर बात किसी की भी करे चाहे वोह क्रिकेट हो या कोई रिअलिटी शो सब पर दर्शको की भरी भीड़ है ,कहीं TRP इतनी जयादा है की एक विज्ञापन को दिखने के लिए कंपनी भरी पोसे लगाने को तैयार है क्युकी सब खेल है TRP का.....